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जीव (जैन दर्शन)

जैनवादी अवधारणा विकिपीडिया से, मुक्त विश्वकोश

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जीव शब्द का प्रयोग जैन दर्शन में आत्मा के लिए किया जाता है। जैन दर्शन सबसे पुराना भारतीय दर्शन है जिसमें कि शरीर (अजीव) और आत्मा (जीव) को पूर्णता पृथक माना गया है। [1] इन दोनों के मेल को अनादि से बताया गया है, जिसे रत्नात्रय (सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, और सम्यक् चरित्र) के माध्यम से पूर्णता पृथक किया जा सकता है। संयम से जीव मुक्ति या मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।"[2]  आचार्य उमास्वामी ने तीर्थंकर महावीर के मन्तव्यों को पहली सदी में सूत्रित करते हुए तत्त्वार्थ सूत्र में लिखा है: "परस्परोपग्रहो जीवानाम्"। इस सूत्र का अर्थ है, 'जीवों के परस्पर में उपकार है'।[3]

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जीव द्रव्य

जैन आत्मा को छह शाश्वत द्रव्यों में से एक मानते हैं जिससे इस सृष्टि की रचना हुई है। आत्मा द्रव्य की दो मुख्य पर्याय है — स्वाभाव (शुद्ध आत्मा) और विभाव (अशुद्ध आत्मा)। जन्म मरण (संसार) के चक्र में पड़ी आत्मा अशुद्ध (संसरी) और इससे मुक्त होने पर शुद्ध आत्मा कहलाती है। [4]

स्थानांतरगमन में आत्मा

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जन्म मरण करती आत्मा के चार क्रमिक शरीर बताए गए है।

जैन दर्शन के अनुसार संसार (स्थानांतरगमन) में फँसी जीव आत्मा चार गतियों में जन्म मरण करती रहती है। यह है— देव, मनुष्य, नरक और तिर्यंच (जानवर एवं पौधें)।

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 नोट

सन्दर्भ

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